Wednesday, June 23, 2021

शादीशुदा का दूसरे के साथ संबंध रखना है अपराध, लिव-इन Relationship नहीं- हाईकोर्ट

Allahabad High Court ने मंगलवार को लिव-इन-रिलेशन (Live in Relationship) को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है.

Court ने कहा है कि शादीशुदा महिला (Married Woman) दूसरे पुरुष के साथ पति- पत्नी की तरह रहते है तो इसे लिव इन रिलेशनशिप (Live in Relationship) नहीं माना जा सकता.

जिस पुरुष के साथ रह रही है वह आईपीसी की धारा 494/495 (Section 494/495 of IPC) के अंतर्गत अपराधी हैं.

Court ने कहा कि परमादेश विधिक अधिकारों (Prerogative Legal Rights) को लागू करने या संरक्षण देने के लिए जारी किया जा सकता है.

किसी भी अपराधी को संरक्षण देने के लिए नहीं. यदि अपराधी को संरक्षण देने का आदेश दिया गया हैं तो यह अपराध को संरक्षण दीने जैसा होगा. कानून के खिलाफ कोर्ट (Court Against LAW) अपनी अंतर्निहित शक्तियों का प्रयोग नहीं कर सकता.

यह आदेश न्यायमूर्ति एसपी केशरवानी तथा न्यायमूर्ति डॉ वाईके श्रीवास्तव की खंडपीठ ने हाथरस निवासी आशा देवी और अरविंद की याचिका को खारिज करते हुए दिया है.

याची आशा देवी महेश चंद्र की विवाहिता पत्नी है. दोनों के बीच तलाक नहीं हुआ हैं. किन्तु याची अपने पति से अलग किसी दूसरे पुरुष के साथ पति- पत्नी की तरह रहती है.

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Court ने कहा कि यह लिव इन रिलेशनशिप (Live in Relationship) नहीं है वरन दुराचार का अपराध है. जिसके लिए वह पुरुष अपराधी है.

याची का कहना था कि वह दोनों लिव इन रिलेशनशिप (Live in Relationship) में रह रहे हैं. उनके परिवार वालों से सुरक्षा प्रदान किया जाए.

Court ने यह भी कहा कि शादीशुदा महिला (Married Woman) के साथ धर्म परिवर्तन (Religion Change) कर लिव इन रिलेशनशिप (Live in Relationship) में रहना भी अपराध है. जिसके लिए अवैध संबंध (illicit Relation) बनाने वाला पुरुष अपराधी है.

ऐसे संबंध वैधानिक नहीं माना जा सकता हैं. Court ने कहा हैं कि जो कानूनी तौर पर विवाह नहीं कर सकते उनका लिव इन रिलेशनशिप (Live in Relationship) में रहना, एक से अधिक पति या पत्नी के साथ संबंध रखना भी अपराध है.

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ऐसे लिव इन रिलेशनशिप (Live in Relationship) को शादीशुदा जीवन नहीं माना जा सकता हैं. और ऐसे लोगों को Court से संरक्षण नहीं दिया जा सकता है.

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